जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि - धैर्य बनाये रखें :-
एक गुरु थे और उनके दो शिष्य थे तो गुरु शिष्यों की परीक्षा लेना चाहते थे । तो उन्होंने अपना पहले शिष्य को बुलाया और उस से पुछा कि "चलो मुझे ये बताओ कि तुम्हे जगत कैसा लग रहा है ?"
इस पर उस शिष्य ने कहा "बहुत बुरा है । सर्वत्र पाप फैला हुआ है । कोरोना जैसी महामारी से चारो ओर अन्धकार ही अन्धकार है ” । फिर वो कहने लगा "आप खुद देखे गुरूजी कितना व्यापक निराशाजनक माहौल है। और तो और तो और दो रातों के बीच एक दिन है प्रकाश कम जबकि अँधेरा ज्यादा ।"
गुरुदेव ने दूसरे शिष्य से भी यही प्रश्न किया तो उसने बोला "गुरूजी जगत बहुत अच्छा है । सर्वत्र उजाला है । लोग महामारी से जूझ रहे हैं । परिस्थिति उन्हें मन मस्तिष्क से मजबूत बना रही है। जो आने वाले वक्त में उन्हें स्वंय पता चलेगा। हर ओर प्रकाश ही प्रकाश है। रात जैसे ही बीत जाती है सुबह का उजाला मन को आनंदित कर देता है । मन अतीव आनंद से भर जाता है ।पता ही नहीं चलता अँधेरी रात कब निकल जाती है । कब अँधेरा छंट जाता है । कब हम प्रकाश की गोद में आ जाते है । दिन गया रात आई रात गयी दिन आ गया फिर से ।दो दिनों के बीच केवल एक रात है कितना अच्छा है न ।"
दोनों शिष्यों ने अपने दृष्टिकोण से जगत की व्याख्या की। जो निराशावादी था उसने निराशाजनक विचार दिए । जबकि जो आशावादी था उसने आशावादी विचार दिए ।
इसलिए जीवन में कभी भी हमे धीरज नहीं खोना चाहिये। परिस्थितियों से मुकाबला करना चाहिए । शीघ्र ही अच्छा समय आएगा , ये विश्वास रखना चाहिए। विपरीत परिस्थितियों से लड़ने से हम मजबूत बनते हैं । कमजोर नहीं । धैर्य बनाये रखें । चीज़े सरलता से होने लगेंगी।


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