प्रार्थना का महत्त्व

!! प्रार्थना का महत्त्व !!

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‘प्रार्थना, अर्थात देवता की शरण जाकर अपनी कामना पूर्ति के लिए याचना करना। प्रार्थना से देवताओं के आशीर्वाद, शक्ति एवं चैतन्य का लाभ मिलता है। प्रार्थना के कारण चिंताएं न्यून होती हैं, देवता के प्रति श्रद्धा बढती है, तथा मन एकाग्र होता है। प्रार्थना से अनिष्ट शक्तियों से रक्षा भी होती है।

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प्रार्थनाओं के कुछ उदाहरण :


प्रात: समय की जाने वाली प्रार्थना:
करदर्शन : दोनों हाथोंकी अंजुलि बनाकर उसपर मन एकाग्र कर निम्न श्लोक बोलें -

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविंदः प्रभाते करदर्शनम् ।।


अर्थ : हाथ के अग्रभागमें लक्ष्मी वास करती हैं । हाथ के मध्य भाग में सरस्वती हैं एवं मूल भाग में गोविंद हैं; इसलिए सुबह उठते ही हाथों के दर्शन लें।



उपरोक्त श्लोक बोलने के उपरांत धरती मां को निम्न प्रकार से प्रार्थना कर भूमि पर चरण रखें।

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडले ।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।।


अर्थ : समुद्र रूपी वस्त्र धारण करने वाली, पर्वत रूपी स्तनयुक्त एवं भगवान श्रीविष्णु की पत्नी, हे पृथ्वी देवी, मैं आपको नमस्कार करता हूं । आपको मेरे पैरों का स्पर्श होगा, इसलिए आप मुझे क्षमा करें ।
भूमि को प्रार्थना कर, ‘समुद्रवसने देवी...’ श्लोक बोलकर भूमि पर पैर रखने से रात्रि के समय तमोगुण से दूषित देह में प्रवाहित कष्ट दायक स्पंदनों का भूमि में विसर्जन होने में सहायता होती है ।’

स्नान से पूर्व जल देवता से की जानेवाली प्रार्थना,
हे जल देवता, आपके पवित्र जल से मेरे स्थूल देह के चारों ओर आया रज-तम का काला आवरण नष्ट होने दें । बाह्य शुद्धि समान मेरा अंतर्मन भी स्वच्छ एवं निर्मल होने दें ।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ।।
अर्थ : हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु एवं कावेरी, आप समस्त नदियां मेरे स्नानके जल में आएं ।



भोजन करते समय निम्न प्रकार से प्रार्थना कर श्लोक बोलें -
प्रार्थना : ‘हे भगवान, इस अन्नको मैं आपका प्रसाद मानकर ही ग्रहण कर रहा / रही हूं । इस प्रसाद से मुझे शक्ति एवं चैतन्य मिलने दें ।’
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ।।
अर्थ : अन्न से पूर्ण, सदा परिपूर्ण रहने वाली, शंकर को प्रिय, हे पार्वती माता, ज्ञान, वैराग्य एवं सिद्धि के लिए हमें भिक्षा दो।



सायंकाल में की जाने वाली प्रार्थना
सायंकाल में पूजा घर, देवता एवं तुलसी के समीप दीपक जलाकर श्लोक बोलें।
‘शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं सुखसंपदाम् ।
मम बुद्धिप्रकाशं च दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ।।’
अर्थ : हमारा शुभ करने वाली, कल्याण करने वाली, हमें आरोग्य एवं सुख संपदा प्रदान कर, बुद्धि को शुद्ध करने वाली हे दीपज्योति, आपको हमारा नमस्कार है ।

इस श्लोक द्वारा दीपक की स्तुति से अनिष्ट शक्तियों को भगानेका कार्य किया जाता है ।’
स्तोत्रपाठ से निर्माण होनेवाले सात्त्विक स्पदंनों से घर की शुद्धि होती है । इससे अनिष्ट शक्तियों का कष्ट भी न्यून होता है।



रात्रि सोने से पूर्व की जानेवाली प्रार्थना-
संपूर्ण दिन में किए समस्त कर्मों को ईश्वर को अर्पण कर, उनके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करें। इसी के साथ अनिष्ट शक्तियों से संरक्षण हेतु अपने चारों ओर सुरक्षा कवच निर्माण होने के लिए प्रार्थना करें।



पढाई करते समय की जानेवाली प्रार्थना,
पढाई आरंभ करने से पूर्व मन ही मन श्रीगणेश-वंदना एवं प्रार्थना करें, ‘हे श्रीगणेश, आप विघ्नहर्ता एवं बुद्धिदाता हैं। मेरी पढाई में सर्व प्रकार की बाधाओं को दूर करने की कृपा करें । मेरी पढाई अच्छी होनेके लिए आप मुझे सुबुद्धि एवं शक्ति प्रदान करें।’
तदुपरांत मन ही मन श्री सरस्वती-वंदना एवं प्रार्थना करें, ‘श्री शारदा देवी, आप साक्षात विद्या की देवी हैं। मेरी पढ़ाई अच्छी होने के लिए आप मेरा मार्ग दर्शन करें।
पढाई पूर्ण होने पर कृतज्ञता व्यक्त करें - ‘हे ईश्वर आपकी कृपा से ही पढाई योग्य ढंग से हो पाई।

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